"अस्लाम आलेकुम,"
उसने चुपके से कहा
उसने चुपके से कहा
उस रात जब जश्न मना
उसके अपनों की चुप्पी पर.
देश के भक्तों ने
घोषणा कर दी:
उस आवाज़ की कोई कीमत नहीं है.
उसी रात आवाज़ों के बाज़ार में,
बेच दी गयी
उकसी दी गयी अमानत
चीखों को दबाकर.
बेच दी गयी उसकी आवाज़
हमारी रूह की कीमत पर.
देश भक्त
भूल गए शायद
इस देश का स्वराज
उसके अपनों की चुप्पी पर.
देश के भक्तों ने
घोषणा कर दी:
उस आवाज़ की कोई कीमत नहीं है.
उसी रात आवाज़ों के बाज़ार में,
बेच दी गयी
उकसी दी गयी अमानत
चीखों को दबाकर.
बेच दी गयी उसकी आवाज़
हमारी रूह की कीमत पर.
देश भक्त
भूल गए शायद
इस देश का स्वराज
अगर अब तक बंधा रहा है
तो सिर्फ आज़ाद आवाज़ों से.
शायद समझते हैं
शान और शौकत की कीमत
आज़ादी है.
बस उस दिन की चिंता है
जब बिक चूका होगा सब कुछ
और खून के दाल दाल में
शायद समझते हैं
शान और शौकत की कीमत
आज़ादी है.
बस उस दिन की चिंता है
जब बिक चूका होगा सब कुछ
और खून के दाल दाल में
बचा रहेगा सिर्फ
इंक़लाब का नारा.
लाज़िम है तब भक्तों को
ज़रुरत महसूस होगी
"आलेकुम सलाम" की.
लाज़िम है तब भक्तों को
ज़रुरत महसूस होगी
"आलेकुम सलाम" की.
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| https://www.journeyb.com/2012/08/awaaz-do.html |


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