अकेला
आकेला हूँ मैं
भटकता हूँ अपने खुद की तलाश में।
अनेक हैं फिर भी
मेरी ही तरह।
डरता हूँ मैं
कहीं कल मेरे साधारणपन को कोई
दूंढ निकालेगा ।
डरता हूँ मैं और भी
की वह शख्स
मैं ही हूँगा।
कानों में जब
सन्नाटे की आवाज़ भर जाती है
तो मैं आखों को मीच लेता हू
हारा नहीं हूँ मैं
सिर्फ़ भागने से
थक गया हूँ।
सच!
मैरे ज़िन्दगी में
न छल कपट
न झूठ, न तोड़े वादे,
न अत्याचार, न हिंसा-
जब उसकी आवश्यकता नहीं थी।
तो क्यूँ ये धुंधलापन
कानों में जब
सन्नाटे की आवाज़ भर जाती है
तो मैं आखों को मीच लेता हूँ।
डर नहीं मंज़िल से भटक जाने का
डर है भीड़ से
और भीड़ में ख़जाने का।
