
जब जंग के बिगुल बज उठेंगे
और रणहुंकार की गरज
भोर की चहचाहट को मसल कर
धरती पर खून बहायेगा -
हम में से कुछ
खुशनसीब होंगे
जिनकी जिस्म और रूह
पल भर में
छितरी छितरी हो जायेंगी ।
हम में से जो बचे रहेंगे-
वो चुप चाप
हज़ारों छोटे छोटे ज़ख्मों से
सूख कर
जहन्नुम के भी
बंद दरवाज़ों को
खटखटाते रह जाएंगे।
No comments:
Post a Comment