Saturday, June 15, 2019

रासलीला


बस 
अब बस. 
अकेले यहाँ 
नहीं खड़े रह सकते हम.
ज़िन्दगी भर 
अपने घरों में बैठकर 
चमगादड़ के तरह 
सोते रहे दिन भर. 
जागे तो 
सिर्फ अपने अँधेरे के लिए. 
बहुत रो लिए हम भी 
टूटे बिखरे लाशों के लिए. 

हम बेवकूफ थे 
जो सोचते थे 
हमारी चीखें 
ऊंची तख्तों तक 
किसी तरह पहुँच कर 
पत्थर दिलों को 
पिघला देंगी. 

पहुंचा तो था 
हमारा कोलाहल 
पर जवाब दिया 
शहनाई और नगाड़ों से. 
भक्तों ने सिर्फ 
दो रसों की लीला रची.
रौद्र और भय 
मंच के नायक थे. 

शहनाई की फटती आवाज़ 
अब मेरे कानों को सुन्न 
कर चुकी हैं। 
भस्म कर चुकीं हैं 
उन  इन्द्रियों को 
जो कभी मुझे 
दुनिया की जटिलता 
की आभास देती थीं. 
चमगादड़ की तरह 
अब व्यासविकता भी 
मेरे साथ 
उल्टी सो रही है. 

बस.
बस!
चाहे हमें किसी खंडाल में 
बर्खास्त  किया हो -
दिन में भले ही 
हम शिकार बने  हों-
रात में उड़ेंगे चाहे 
अमावस्या क्यों न हो !
चमकती भड़कीली मंच पर 
उसकी काली परछाई को 
बेनकाब कर 
बिगूलों के खूटे स्वरों को
अपनी करकशी से दबाएंगे . 
भले ही आँखों से करनी हो बातें 
अकेले नहीं रहेंगे और. 
चिमगादड़  झुण्ड में 
निकलते हैं -
एक साथ ही 
काली पर्दों के सामने 
खेलेंगे 
सच्ची रासलीला. 


No comments: