गरम चाय की फरमाइश थी।
गर्मियों में भी,
गरमागरम
गपशप की कुछ और ही बात है।
बीते हुए ज़माने की ,
आज के उबढ़ खाबढ़ की,
चीनी और दूध के
मिलावट की ,
चाय के साथ
सुढ़ सुढ़ के
पी रहे थे।
स्टाल में अड्डा बनाके ,
बैठ जाते थे
अपनी प्लेट में
नमकीन बिस्कुट लिए।
चाय के बहाने ,
घुल जाते थे हम भी
शोर के भंवर में .
समय भी
चाय में दुबकी लगाता रहता।
बना देता,
चाय के स्वाद को
मीठे से,
नमकीन से,
गंभीर।
जब चाय ठंडी हो गयी
तो समय भी बह कर काला हो गया।
गटक लिया तक्कलुफ़ को
जो ख़ामोशी के आखरी पलों में
जल्दबाजी से भर दिया गया।
रह गया
सिर्फ़
खाली कप।
बची हुई
चाय की काली पत्तियां ,
जो तेर कर ऊपर न आ सकीं ,
और डूबा हुआ
बिस्कुट का चूरा ने
अपनी किस्मत को
कबूल कर लिया।
धुला हुआ कप ने
फिर गरम चाय से
नयी गप शप की चाबी
भर डाली।

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